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Chanda Kochhar Guilty in ICICI-Videocon Bribery Case

Published On: July 22, 2025
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परिचय: बैंकिंग जगत की चमक और गहराई से गिरावट

चंदा कोचर, ICICI बैंक की पूर्व CEO و MD, बैंकिंग की दुनिया में महिलाओं के लिए प्रेरणा थीं। उन्होंने प्रबंधन की शुरुआत से लेकर बैंक की ऊँचाइयों तक का सफर तय किया। परन्तु, अब उनका नाम भारत के वित्तीय भ्रष्टाचार इतिहास में दर्ज हो गया है। हाल ही में SAFEMA की अपीलीय ट्रिब्यूनल ने उन्हें ₹64 करोड़ की रिश्वत लेने की सज़ा सुना कर उनकी छवि को धक्का पहुंचाया है (Wikipedia)।

आरोपों का ताना-बाना: कैसे बने ट्रैप में

  • ₹300 करोड़ का लोन: 2009 में ICICI बैंक ने Videocon International Electronics Ltd को ₹300 करोड़ का ऋण दिया, जिस पर कोचर सदस्य थीं (Business Standard)।
  • ₹64 करोड़ का “उपहार”: अगले ही दिन Videocon Group ने यह राशि Supreme Energy Pvt Ltd के माध्यम से NuPower Renewables Pvt Ltd में ट्रांसफर की—जो दीपक कोचर (चंदा कोचर के पति) का स्वामित्व था (The Hindu)।
  • क्विड-प्रो-क्वो कनेक्शन: SAFEMA ट्रिब्यूनल ने मूल रूप से पाया कि यह एक स्पष्ट रिश्वत लेन-देन था—एक तय समझौता (quid pro quo), जिसमें बैंक का ऋण बैंक की नीतियों के खिलाफ लाभ प्राप्त करने के लिए स्वीकृत हुआ।

कानूनी मोड़: PMLA से SAFEMA तक का सफर

  1. PMLA की प्राथमिकी (Jan 2020): ED ने ₹78 करोड़ की सम्पत्ति अटैच की—जिसमें मुंबई में फ्लैट, भूमि, मशीनरी आदि शामिल थे (mint)।
    (Hindustan Times, The Economic Times)।
    (The Economic Times, The420.in)।
    (The420.in)।

चंदा कोचर का करियर: सफलता से विवाद तक

शुरुआती उत्थान:

जोधपुर के बाद मुंबई में पढ़ाई, ICICI बैंक में 1982 में प्रवेश, और 2009 तक CEO व MD बनना—एक प्रेरक यात्रा (Wikipedia)।

विवादित मोड़:

  • Conflict of Interest: उनके निजी जीवन (पति की कंपनी) और कार्यकारी निर्णयों में गहरा हित-संघर्ष था (Wikipedia, Business Standard)।
  • Resignation और बर्खास्तगी: मीडिया रिपोर्ट्स और आंतरिक जांचों के बाद अक्टूबर, 2018 को इस्तीफा; बाद में ICICI बैंक ने उन्हें बर्खास्त किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा (Wikipedia)।

कानूनी कार्रवाई vs बचाव थीसिस

ED/CBI की दलीलें:

  • ₹3,250 करोड़ से अधिक के ऋणों में भारी अनियमितताएँ (Wikipedia)।
  • ₹64 करोड़ की हुंकार प्रधान रिश्वत जो बैंक नीतियों के टूटने की पुष्टि करती है (The Hindu, Business Standard, The Times of India)।
  • चंदा और दीपक के बीच वित्तीय लेन-देन में मिलीभगत और अनियमित दस्तावेज (The Hindu)।

चंदा-दीपक की दलील:

  • PMLA न्यायाधिकरण ने समर्थन दिखाया, कहकर कि वे बैंक नीति के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं, और जो संपत्ति दी गई वह ₹78 करोड़ नहीं, बैंक नुकसान प्रकट करने में विफल थी (Hindustan Times)।
  • फ्लैट खरीदी 1995-96 में की गयी और 2009 से सार्थक रेशा नहीं (Hindustan Times)।

SAFEMA ट्रिब्यूनल की कठोर टिप्पणी

  • बेलाग मान्यता दी कि ₹64 करोड़ रिश्वत थी और यह ₹300 करोड़ लोन का प्रतिफल था (The420.in)।
  • पहले के निर्णयों को “irrelevant considerations” और “ignored material facts” कहा (The420.in)।
  • आदेश दिया कि ED द्वारा अटैच की गई ₹78 करोड़ की संपत्ति वैध रूप से बनी—PMLA न्यायाधिकरण निर्णय को पलट दिया गया (The420.in, The Economic Times)।

इसका महत्व: कॉरपोरेट कोर्ट-गवर्नेंस, बैंकिंग नैतिकता

  • यह मामला उच्च स्तरीय अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने में अहम भूमिका निभाता है।
  • यह स्पष्ट करता है कि हित-टकराव का रवैया, जहां नेता निजी लाभ ले रहे हों, व्यापक जांच विहीनता बढ़ाता है।
  • PMLA एवं SAFEMA जैसे अधिनियमों की कार्यप्रणाली का भी परीक्षण है।

आगे की राह: चुनौतियाँ और संभावनाएँ

  1. ट्रायल कोर्ट: ₹64 करोड़ रिश्वत और धोखाधड़ी के आरोपों की विस्तृत सुनवाई अब Trial Court में होगी।
  2. न्यायिक एप्पील: चंदा-दीपक अपने बचाव हेतु उच्च न्यायालय वं सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
  3. कॉरपोरेट गवर्नेंस सुधार: बैंकिंग नीतियों में हित संघर्ष से बचने की सख्त व्यवस्था की आवश्यकता खुलकर सामने आई है।
  4. जवाबदेही की मिसाल: अदालती फैसलों से स्पष्ट संदेश गया कि बैंक कार्यवाही में पारदर्शिता जरूरी है।

चंदा कोचर का पतन—उनके सशक्त करियर की तुलना में—एक चेतावनी है। उच्च पद पर आसीन महिलाएं हो या पुरुष, यदि निजी हितों को सार्वजनिक जिम्मेदारियों से जोड़ ली जाती है, तो नौकरशाही का पतन तय है। SAFEMA ट्रिब्यूनल द्वारा अंतिम निर्णय ने मैसेज दिया है: “कोई भी अधिकारी नियमों से ऊपर नहीं”। यह आने वाले समय के लिए एक मिसाल बनता है—जहां बैंकिंग जागरूकता, नीति, नैतिकता का गठबंधन आवश्यक है।

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