💥 रूस, यूक्रेन और वैश्विक राजनीति की नब्ज़
अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने हाल ही में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को एक कड़ा मैसेज भेजा है: “वो तब तक रुकेगा नहीं जब तक कोई उसे रोकने की हिम्मत नहीं करता.” ग्राहम ने सीधे तौर पर उन देशों की ओर इशारा किया जो अभी भी रूस से तेल, गैस या अन्य व्यापार कर रहे हैं—भारत, चीन और ब्राजील। उन्होंने उन्हें “ब्लड मनी” कहा, यानी उन्हीं पर आरोप लगाया जो रूसी युद्ध को आर्थिक रूप से पोषण दे रहे हैं।
🔥 मुकाबला पुतिन और अमेरिका का?
ग्राहम ने अमेरिकी बहुतायत (Republican) और युद्ध नीतियों के दृष्टिकोण से यह साफ़ किया कि अगर पुतिन यूक्रेन पर वार जारी रखता है, तो उसका आर्थिक खामियाजा रूस को भुगतना पड़ेगा—और साथ ही, जिन देशों ने पुतिन को अभी तक रोकने की कोशिश नहीं की, उनकी “गलती बड़ी लीग की” कही। “गेम बदल गई है,” ग्राहम ने कहा।
उन्होंने आरोप लगाया कि पुतिन यूक्रेन व अन्य देशों पर कब्ज़ा करके एक बार फिर सोवियत संघ जैसा रिस्टोर करना चाहता है। “पुतिन उन देशों को लेना चाहता है जो उसके नहीं हैं,” ग्राहम बोले और याद दिलाया कि 1990 के दशक में यूक्रेन ने अपने 1,700 परमाणु हथियार छोड़ दिए थे—रूस की तरफ से अपना सार्वभौमिक सम्मान बनाए रखने का आश्वासन लेकर। लेकिन, ग्राहम के अनुसार, पुतिन ने वह वादा तोड़ा।
🛡 ट्रम्प की वापसी और शीत युद्ध?
ट्रम्प प्रशासन में रूस के साथ भारी टकराव दिख रहा है—वैश्विक राजनीति का एक नया मोड़। पिछली बार केवल सात महीने पहले, जब ट्रम्प फिर से राष्ट्रपति कार्यालय में वापस आए, उन्होंने युद्ध खत्म करने की कसम खाई थी। लेकिन, आज स्थिति उलटती जा रही है: रूस लगातार यूक्रेनी शहरों पर ड्रोन और मिसाइल हमले तेज कर रहा है।
ट्रम्प की हालिया घोषणा ने इस इर्द‑गिर्द हलचल मचा दी—उन्होंने यूक्रेन को नए हथियार देने और यदि शांति समझौता अगले 50 दिनों में नहीं हुआ तो रूस से तेल लेने वाले देश—जैसे भारत, चीन, ब्राज़ील—पर “बाइटिंग” यानी कड़ी द्वितीयक टैरिफ लगाने की बात कही। अगर समझौता नहीं हुआ, तो ये देश 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैक्स झेलेंगे।
🌍 नाटो की चेतावनी: ब्राज़ील, चीन, भारत को आड़े हाथों लेने की धमकी
इस घोषणा के बाद NATO के महासचिव मार्क रुटे ने उन तीनों देशों को चेतावनी दी कि अगर वे रूस से व्यापार नहीं बंद करेंगे, तो उन्हें द्वितीयक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा।
रुटे ने कहा:
“मैं इन तीनों देशों—ब्राज़ील, भारत और चीन—को यह कहने के लिए उत्साहित करता हूँ कि कृपया पुतिन को फोन करें और उसे समझाएं कि उसे शांति वार्ता की गंभीरता से शुरुआत करनी होगी, वरना इसका भारी असर इन देशों पर पड़ सकता है।”
🇮🇳 भारत का रुख: “दोहरा मापदंड नहीं”
NATO महासचिव की इस धमकी के बाद भारत की विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। मंत्रालय ने कहा कि वह इस सबको गौर से देख रहा है, और भारत की प्राथमिकता अपने लोगों की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना है। उन्होंने “दोहरे मानकों” की चेतावनी दी—यदि ऐसे मानक अपनाए जाएंगे, तो हम उसकी समीक्षा करेंगे।
वे बोले कि भारत इस मामले में बाजार की नज़रों और वैश्विक परिस्थितियों से प्रेरित है। यानी जब तक रूस से आयात करना भारत के लिए आवश्यक हो, और यह वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप हो, तब तक कोई प्रतिबंध नहीं लगाए जाएंगे।
विश्लेषण: यह खेल राजनीतिक चौराहे पर क्यों है?
- वैश्विक रणनीतिक स्थिति
शीत युद्ध के दौर से निकलकर आज हम एक नए “ऊर्जा-राजनीतिक” गेम में प्रवेश कर रहे हैं। रूस को ऊर्जा निर्यात से आय होती है, लेकिन उसके लिए उसे वैकल्पिक बाजार नहीं मिलने पर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। - बीच का पकड़: भारत, चीन और ब्राज़ील
ये देश अभी रूस से तेल, गैस, खाद या अन्य उत्पाद खरीदना जारी रखे हुए हैं। ऐसा करने का कारण सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि घरेलू जरूरतों को पूरा करना है। साथ ही, ये बड़े वैश्विक खिलाड़ी हैं जो ऊर्जा सुरक्षा को कुल ताकत (national security) से जोड़ते हैं। - द्वितीयक प्रतिबंध – क्रांतिकारी परिवर्तन?
संयुक्त राज्य अमेरिका के ज़रिए NATO जैसे गठबंधन द्वितीयक प्रतिबंधों को हथियार बना रहे हैं—यानी अब भारत जैसे तीसरे देशों को भी सीधे लक्ष्य में लेना। इससे वैश्विक आर्थिक अलायंस का चेहरा बदल सकता है, और बहुसंख्यक देशों में नई रणनीतिक आलोचनाएं उभर सकती हैं। - भारत की दोहरी नीति
भारत एक ओर रूस के साथ मजबूत रक्षा संबंध बनाए रखता आया है (हेलीकॉप्टर, बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक, आदि में सहयोग की लाइन)। दूसरी ओर, वह पश्चिमी देशों के साथ भी दोस्ताना संबंध रखता है—विशेषकर टेक्नोलॉजी, व्यापार और निवेश में। ऐसे में यह “दोहरा मापदंड” नीति भारत की रणनीतिक विशुद्धता को चुनौती देती है।
आगे का परिदृश्य: क्या संभव हो सकता है?
🔹 बातचीत में गति
पुतिन को अगर सच में रोकना है, तो सभी परमाणुरणित देश—भारत, चीन, ब्राज़ील—उनकी तरफ से भी दबाव आने चाहिए। ट्रम्प और NATO इसे पार्टनर्स के सहयोग से वैधानिक दबाव में बदल रहे हैं। आने वाले 50 दिनों की खिड़की इस रणनीति की कसौटी बन चुकी है।
🔹 वैश्विक व्यापार-ऊर्जा तंत्र में बदलाव
अगर द्वितीयक प्रतिबंध लागू होते हैं, तो ऊर्जा व्यापार मॉडल बदल सकता है। इसके ठहराव पर किसी तरह का तकनीकी या राजनीतिक विवाद हो सकता है। ऊर्जा की वैकल्पिक व्यवस्था ढूंढने पर जोर बढ़ सकता है: जैसे मध्य पूर्व, अफ्रीका, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया से आयात विकल्पों की ओर।
🔹 भारत की स्थिति: संतुलन या निर्णय?
भारत के पास एक चुनौती है। क्या वह रक्षा साझेदारी को प्राथमिकता देगा और पश्चिमी आर्थिक दबाव को टालकर ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखेगा? या यूक्रेन युद्ध को रोकने के लिए वैश्विक निवारण के साथ कदम से कदम मिलाएगा? इस दौर में भारत की नीति दिशा संकेत करेगी कि ये “विश्व शक्ति रूपांतरण” किस मोड़ से गुज़रेगा।
- ग्राहम का संदेश: “अगर पुतिन रुका नहीं, तो हम उसे आर्थिक रूप से पस्त करेंगे, और जो उसे आर्थिक सहयोग दे रहे हैं, वे ‘ब्लड मनी’ कमा रहे हैं।”
- ट्रम्प और NATO का दबाव: शांति समझौते न होने पर पुतिन को रोका जाना है—पाकीज़ा 50 दिनों की समय सीमा—और अगर तीनों ऊर्जा आयातकर्ता नहीं पीछे हटे, तो उन पर बीमटरी अधिभार की धमकी भी।
- भारत का रुख: “हम अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को प्राथमिकता देंगे और कोई भी दोहरा मापदंड हमें मंजूर नहीं।”










