कर्नाटक की सत्ता की जंग अब दिल्ली तक: ‘बाबू बनाम बाबू’ की राजनीति
भारत के राज्यों में सत्ता संघर्ष कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब ये विवाद केंद्र की राजधानी दिल्ली तक पहुंच जाता है, तो मामला और भी दिलचस्प हो जाता है। कर्नाटक में वर्तमान में चल रही राजनीतिक खींचतान का नया अध्याय इसी तरह की एक घटना के रूप में सामने आया है, जिसमें राज्य सरकार के दो वरिष्ठ अधिकारी कर्नाटक भवन, दिल्ली में आमने-सामने आ गए। इस विवाद ने न सिर्फ अफसरशाही के अंदरूनी मसलों को उजागर किया है, बल्कि कर्नाटक की राजनीति में चल रही गहरी दरार को भी सबके सामने ला दिया है।
घटना का सिलसिला: कर्नाटक भवन में तनाव की चिंगारी
22 जुलाई 2025 को कर्नाटक भवन, जो दिल्ली में कर्नाटक सरकार का कार्यालय है, वहां एक विवाद हुआ। इस विवाद में मुख्य भूमिका दो वरिष्ठ अधिकारियों की थी—सी मोहन कुमार, जो मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के स्पेशल ड्यूटी ऑफिसर (SDO) हैं, और एच अंजनैया, जो उपमुख्यमंत्री और कर्नाटक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. के शिवकुमार के एसडीओ हैं।
अंजनैया ने अपनी शिकायत में कहा कि मोहन कुमार ने उनके साथ न सिर्फ अभद्र भाषा का प्रयोग किया, बल्कि उन्होंने ऑफिस में सभी कर्मचारियों के सामने उनके ऊपर जूता चलाने की धमकी भी दी। यह एक ऐसा क़दम था जिसने कर्नाटक भवन के माहौल को पूरी तरह से तनावपूर्ण बना दिया।
शिकायत और जांच
इस घटना के बाद, अंजनैया ने कर्नाटक भवन के रेजिडेंट कमिश्नर इमकोंगला जमीर और कर्नाटक के मुख्य सचिव शालिनी राजनीश के पास औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में मोहन कुमार पर उत्पीड़न और अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया। अंजनैया ने कहा कि यह पहली बार नहीं था जब उनके साथ ऐसा व्यवहार हुआ, बल्कि पिछले कई महीनों से विभिन्न तरह की बाधाएं और परेशानियां उनके सामने आती रही हैं।
मुख्य सचिव शालिनी राजनीश ने शिकायत मिलते ही एक आधिकारिक जांच का आदेश दिया और कर्नाटक भवन के रेजिडेंट कमिश्नर से इस मामले की रिपोर्ट मांगी।
मामले के पीछे की राजनीति
जहां यह विवाद एक ऑफिस में दो बाबुओं के बीच का झगड़ा लग रहा था, वहीं इसकी राजनीतिक गूंज बहुत तेज़ी से फैल गई। कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनके डिप्टी के. शिवकुमार के बीच पिछले कुछ समय से मतभेद की खबरें आ रही हैं। ये दोनों नेता 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के पीछे मुख्य चेहरे थे, लेकिन अब उनके बीच चल रहे तनाव ने पार्टी की छवि को प्रभावित किया है।
कर्नाटक बीजेपी ने इस विवाद का भरपूर राजनीतिक फायदा उठाया है। विपक्ष के नेता और बीजेपी के कर्नाटक प्रभारी आर अशोक ने इसे कांग्रेस की सरकार में विद्यमान फूट और विघटन का सबूत बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक कड़ा संदेश देते हुए कहा कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व यानी मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी पूरी तरह से कर्नाटक की स्थिति पर नियंत्रण खो चुके हैं।
आर अशोक ने कहा,
“सीएम सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम के शिवकुमार के बीच चल रही सार्वजनिक जंग ने कर्नाटक की राजनीति को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। दिल्ली में कर्नाटक भवन में खुले आम धमकियां देना और सत्ता संघर्ष चलाना कांग्रेस की सरकार के लिए बेहद खतरनाक और शर्मनाक है। कर्नाटक के लोग इससे बेहतर हकदार हैं।”
कर्नाटक कांग्रेस में चल रही फूट
सिद्धारमैया और शिवकुमार की जोड़ी को पहले कर्नाटक कांग्रेस की ताकत माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ महीनों में इनके बीच दरारें बढ़ती दिख रही हैं। दोनों नेताओं ने जून 2025 के बाद तीन बार दिल्ली जाकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की, जो अक्सर सरकार के मुद्दों पर चर्चा के नाम पर होती हैं। परंतु अंदरखाने यह माना जा रहा है कि ये मुलाकातें पार्टी में चल रही आपसी जंग को शांत करने की कोशिशें हैं।
इस राजनीतिक जंग का असर कर्नाटक सरकार के कामकाज पर भी पड़ रहा है। अफसरशाही में भी इसका असर साफ दिख रहा है, जैसा कि कर्नाटक भवन में हुए इस विवाद से पता चलता है।
अफसरशाही का अंतर्निहित संकट
अक्सर राजनीतिक मामलों का असर प्रशासन पर भी पड़ता है। इस मामले में दो बाबुओं की भिड़ंत ने प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी को उजागर किया। शिकायत के अनुसार, मोहन कुमार ने अंजनैया के खिलाफ कई शिकायतें भी दर्ज करवाई हैं, जिसमें उन्होंने अंजनैया पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया है। मोहन कुमार का कहना है कि वे कर्नाटक भवन में अनुशासन बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।
लेकिन विवाद के बीच एक बात साफ है—यह वातावरण दोनों अधिकारियों के लिए और अन्य कर्मचारियों के लिए काम करना कठिन बना रहा है। अंजनैया ने अपने ट्रांसफर की भी मांग की है ताकि वे इस विषैले माहौल से बच सकें।
राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर सवाल
यह विवाद एक साधारण अफसरशाही झगड़े से कहीं अधिक बड़ा सवाल उठाता है। क्या यह राज्य सरकार के भीतर सत्ता संघर्ष का परिणाम है? क्या कर्नाटक कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व स्थिति को संभालने में असमर्थ है? क्या दिल्ली में बैठे पार्टी के उच्चाधिकारियों को कर्नाटक में हो रही इस खींचतान की सही जानकारी नहीं है?
इन सवालों के जवाब खोजने के लिए हमें कर्नाटक की राजनीति की गहराइयों में जाना होगा। सिद्धारमैया और शिवकुमार दोनों ही कर्नाटक कांग्रेस की मजबूत शाखाएं हैं, लेकिन उनकी अपने-अपने समर्थकों के बीच राजनीतिक घमासान ने पार्टी के भीतर एक गहरे फूट को जन्म दिया है।
कर्नाटक की राजनीति में नया मोड़
कर्नाटक सरकार के दो शीर्ष नेताओं के अधिकारियों के बीच यह विवाद सिर्फ एक नन्ही-सी घटना नहीं है, बल्कि यह कर्नाटक की राजनीति में चल रहे सत्तासंघर्ष का दर्पण है। जहां एक तरफ जनता विकास और सुशासन की उम्मीद करती है, वहीं दूसरी तरफ सत्ताधारी पार्टी के अंदर खींचतान और लड़ाई से सरकार की छवि प्रभावित हो रही है।
यह विवाद दिल्ली तक पहुंचना यह संकेत देता है कि अब कर्नाटक की राजनीति सिर्फ राज्य के भीतर सीमित नहीं रही, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गई है।
अगले कुछ महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस जंग को कैसे संभालता है और क्या सिद्धारमैया-शिवकुमार की जोड़ी फिर से एक साथ आ पाती है या फिर कर्नाटक की राजनीति में कोई नया अध्याय शुरू होता है।










