---Advertisement---

Why Kharge Missed Karnataka CM Post

Published On: July 28, 2025
Follow Us
---Advertisement---

जब मुख्यमंत्री बनने का सपना अधूरा रह गया: मल्लिकार्जुन खड़गे की एक दिलचस्प राजनीतिक कहानी

भारतीय राजनीति में ऐसे कई मौके आते हैं जब मेहनत, समर्पण और संघर्ष के बावजूद किसी नेता को वह मुकाम नहीं मिल पाता जिसके वह असली हकदार होते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ज़िंदगी में भी एक ऐसा ही क्षण आया, जब कड़ी मेहनत और पार्टी के प्रति वर्षों की निष्ठा के बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला। इस लेख में हम बात करेंगे उस किस्से की, जब खड़गे कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से चूक गए और किस तरह यह फैसला उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ बना।

कहानी की शुरुआत: कांग्रेस में खड़गे का सफर

मल्लिकार्जुन खड़गे का राजनीतिक जीवन बहुत ही लंबे समय से चला आ रहा है। वे भारतीय राजनीति के उन नेताओं में से हैं जिन्होंने जमीनी स्तर से शुरुआत की और धीरे-धीरे राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। कर्नाटक में दलित समाज से आने वाले खड़गे ने हमेशा सामाजिक न्याय, शिक्षा और विकास के मुद्दों पर काम किया है।

1980 के दशक में वे राज्य सरकार में मंत्री बने और शिक्षा, ग्रामीण विकास, श्रम एवं अन्य अहम विभागों में काम किया। लेकिन 1990 के दशक के अंत में वे उस वक्त कांग्रेस विधायक दल के नेता बन चुके थे, जब पार्टी एक बार फिर सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही थी।

1999: मुख्यमंत्री बनने का सुनहरा अवसर

1999 का समय कांग्रेस के लिए कर्नाटक में बहुत ही निर्णायक था। पार्टी ने चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया और सरकार बनाने की स्थिति में आ गई। उस वक्त खड़गे कांग्रेस विधायक दल के नेता थे और उन्होंने चुनाव जीतने के लिए दिन-रात मेहनत की।

एक हालिया कार्यक्रम में खड़गे ने उस दौर को याद करते हुए कहा:

“मैंने विधायक दल के नेता के रूप में हरसंभव प्रयास किए ताकि हम सत्ता में आ सकें। हमने सरकार बनाई भी, लेकिन जैसे ही हम सत्ता में आए, एस.एम. कृष्णा को मुख्यमंत्री बना दिया गया — वो भी तब जब उन्होंने सिर्फ चार महीने पहले ही पार्टी जॉइन की थी।”

यह बयान उनके दिल की उस कसक को बयां करता है जो वर्षों से उनके अंदर दबी हुई थी।

“मेरी सारी मेहनत बह गई”: खड़गे की पीड़ा

खड़गे ने कहा कि उन्होंने पूरे पांच साल कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए मेहनत की, लेकिन जब सरकार बनी तो उन्हें किनारे कर दिया गया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा:

“मेरी सारी सेवा, मेरा सारा संघर्ष जैसे बह गया। पांच साल तक मैंने बिना थके मेहनत की, लेकिन जिसे चार महीने हुए थे, उसे मुख्यमंत्री बना दिया गया।”

उनका यह बयान न केवल व्यक्तिगत दुख को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि राजनीति में वरिष्ठता और योगदान की जगह कभी-कभी जातीय समीकरण और राजनीतिक समीपता अधिक महत्व रखते हैं।

एस.एम. कृष्णा की नियुक्ति और जातीय राजनीति का प्रभाव

कर्नाटक की राजनीति में जातीय समीकरण एक अहम भूमिका निभाते हैं। एस.एम. कृष्णा वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, जो राज्य की एक प्रभावशाली जाति मानी जाती है। वहीं मल्लिकार्जुन खड़गे अनुसूचित जाति समुदाय से हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 1999 में जब कांग्रेस ने मुख्यमंत्री चुनने का फैसला किया, तब जातीय समीकरणों ने बड़ा असर डाला। पार्टी नेतृत्व ने कृष्णा को चुना, यह सोचते हुए कि वे एक प्रभावशाली समुदाय से आते हैं और सत्ता के सामाजिक समीकरण को संभाल सकते हैं।

इस फैसले ने खड़गे को गहरा झटका दिया, क्योंकि वह न केवल वरिष्ठ थे, बल्कि जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय भी थे।

खड़गे की भूमिका इसके बाद भी बनी रही अहम

हालांकि खड़गे को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे एस.एम. कृष्णा की सरकार में मंत्री बने और 2009 तक राज्य की राजनीति में एक अहम चेहरा बने रहे। इसके बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा और राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा।

उनकी राजनीतिक यात्रा का यह हिस्सा दिखाता है कि खड़गे एक सच्चे कर्मयोगी हैं। उन्होंने कभी भी अपनी महत्वाकांक्षा को पार्टी से ऊपर नहीं रखा, बल्कि हर समय पार्टी के फैसलों का सम्मान किया।

2022: कांग्रेस अध्यक्ष बनना — एक नई शुरुआत

राजनीति में धैर्य और समर्पण का फल देर से ही सही, मिलता जरूर है। 2022 में मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। यह पद उन्हें शशि थरूर के खिलाफ हुए संगठनात्मक चुनाव में जीत के बाद मिला। इस चुनाव में वे गांधी परिवार के पसंदीदा उम्मीदवार माने जा रहे थे, और उनकी जीत ने यह साबित किया कि पार्टी आज भी उनके अनुभव और निष्ठा को मान्यता देती है।

एक राजनीतिक और व्यक्तिगत कसक का सार्वजनिक बयान

खड़गे का यह बयान कि “मेरी सेवा बह गई”, कोई साधारण टिप्पणी नहीं है। यह एक वरिष्ठ नेता की वह टीस है जो दशकों तक राजनीति में रहते हुए भी दिल में दबा कर रखी गई थी। इस बयान ने दिखा दिया कि राजनीतिक सफलता सिर्फ चुनाव जीतने या पद मिलने से नहीं मिलती, बल्कि कभी-कभी वह मान्यता भी उतनी ही जरूरी होती है जो किसी को उनका हक दिलाए।

खड़गे की कहानी से क्या सीख मिलती है?

मल्लिकार्जुन खड़गे की यह कहानी राजनीति में महत्वाकांक्षा, संघर्ष और त्याग के अनोखे संगम को दर्शाती है। इसमें कई महत्वपूर्ण संदेश छुपे हैं:

  1. राजनीति में धैर्य बेहद जरूरी है: खड़गे ने दिखाया कि अगर आपका इरादा सही है और आप ईमानदारी से काम करते हैं, तो देर-सवेर आपको आपकी मेहनत का फल मिलता है।
  2. जातीय राजनीति की सच्चाई: भारत जैसे देश में राजनीति अक्सर जातीय समीकरणों पर भी आधारित होती है। यह एक कड़वा सच है कि कई बार मेहनत और वरिष्ठता को पीछे छोड़कर जातीय प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी जाती है।
  3. निष्ठा का पुरस्कार: खड़गे का कांग्रेस पार्टी के प्रति समर्पण कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने अपनी भूमिका चाहे जो भी रही हो, उसे पूरी ईमानदारी से निभाया और अंततः राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद तक पहुंचे।

एक नेता, एक संघर्ष, एक प्रेरणा

मल्लिकार्जुन खड़गे की कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो जीवन में बार-बार असफलताओं का सामना करते हैं। उन्होंने कभी हार नहीं मानी, कभी पार्टी से नाराज़ होकर अलग नहीं हुए, और हमेशा जनहित को सर्वोपरि रखा।

हालांकि वे उस समय मुख्यमंत्री नहीं बन पाए, लेकिन आज वे पूरे देश में कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं। उनका यह सफर बताता है कि असली नेता वह होता है जो निजी महत्वाकांक्षाओं को जनसेवा में बदल दे।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment