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Bengal SIR Data Released Amid Bihar Electoral Roll Controversy

Published On: July 30, 2025
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बंगाल की 2022 की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) डेटा का खुलासा और बिहार में चुनावी रोल संशोधन को लेकर चल रही चर्चाएं

भारत में हर चुनाव के पहले चुनावी रोल (मतदाता सूची) की सही-सही समीक्षा और संशोधन करना बेहद जरूरी होता है। ताकि केवल वास्तविक और योग्य मतदाता ही चुनाव प्रक्रिया में शामिल हो सकें। इसी सिलसिले में चुनाव आयोग (ECI) समय-समय पर विशेष संशोधन अभियान चलाता है, जिसे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कहा जाता है। हाल ही में पश्चिम बंगाल की 2022 की SIR की डेटा सार्वजनिक की गई है, जो खासतौर पर बिहार में आगामी चुनाव से पहले हो रहे संशोधन के बीच चर्चा में आई है।

इस लेख में हम विस्तार से इस प्रक्रिया, इसके महत्व, विवाद और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को समझेंगे।

चुनावी रोल का विशेष संशोधन क्यों जरूरी है?

चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि चुनावी रोल में केवल वही लोग शामिल हों जो वोट देने के हकदार हैं। समय के साथ अनेक कारणों से मतदाता सूची में गड़बड़ी हो सकती है:

  • कुछ लोगों का निधन हो जाना
  • स्थानांतरण या माइग्रेशन के कारण नाम हटना या जोड़ना
  • नए मतदाताओं का जुड़ना, खासकर युवा पहली बार वोट देने वाले
  • गैरकानूनी या गलत दस्तावेजों के आधार पर नाम जोड़ना

इसलिए समय-समय पर मतदाता सूची की समीक्षा और साफ-सफाई करना जरुरी हो जाता है, जिससे फर्जी या मृतक वोटरों के नाम हट जाएं और नए योग्य मतदाताओं को शामिल किया जा सके।

2022 में पश्चिम बंगाल की SIR का डेटा जारी

चुनाव आयोग ने हाल ही में पश्चिम बंगाल की 2022 में की गई SIR का डेटा जारी किया है। यह डेटा राज्य के 23 जिलों में से 11 जिलों से जुड़ा है, जिनमें:

  • कूच बिहार
  • जलपाईगुड़ी
  • दार्जिलिंग
  • उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर
  • मालदा
  • नादिया
  • हुगली
  • हावड़ा
  • मिदनापुर
  • बांकुड़ा

जैसे महत्वपूर्ण जिले शामिल हैं, और कुल 294 विधानसभा क्षेत्रों में से 103 के मतदाता आंकड़े इसमें शामिल हैं। बाकी के क्षेत्रों का डेटा भी जल्द ही अपडेट किया जाएगा।

इस विशेष संशोधन में करीब 60% मतदाताओं को दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं थी, उन्हें केवल अपने विवरणों की पुष्टि करनी थी और फॉर्म भरने थे। यह प्रक्रिया मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए एक संदर्भ के तौर पर महत्वपूर्ण मानी जाती है।

बिहार में SIR संशोधन और उससे जुड़ी चिंताएं

बिहार में आगामी चुनावों से पहले चुनाव आयोग ने चुनावी रोल में संशोधन करने की प्रक्रिया शुरू की है। लेकिन इसे लेकर बहुत विरोध और आलोचना हो रही है। विपक्षी पार्टियां इसे जल्दबाजी में किया गया कदम बता रही हैं, जिसमें जरूरी दस्तावेज न रखने वाले खासतौर पर पिछड़े और कमजोर वर्गों को वोटर लिस्ट से बाहर रखा जा सकता है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी बिहार में हो रहे इस SIR पर कड़ी आपत्ति जताई है और इसे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को छुपकर लागू करने की साजिश बताया है। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं और बूथ स्तर के अधिकारियों को साफ निर्देश दिया है कि बंगाल में ऐसे किसी भी SIR का विरोध किया जाए और किसी भी मतदाता के नाम को सूची से हटाने की अनुमति न दी जाए।

SIR के विरोध में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया है कि बिहार के पड़ोसी जिलों में मतदाता नामांकन के लिए आवेदन में अचानक भारी वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि यह उस समय हुआ जब राज्य प्रशासन ने जिला अधिकारियों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया था। अधिकारी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा है कि वे 25 जुलाई 2025 के बाद जारी किए गए किसी भी डोमिसाइल सर्टिफिकेट को SIR प्रक्रिया में स्वीकार न करें।

वहीं तृणमूल कांग्रेस की विधायक महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में बिहार की SIR प्रक्रिया को चुनौती दी है। उन्होंने दावा किया है कि इस प्रक्रिया का स्वरूप और नतीजे NRC से मिलते-जुलते हैं, जिसमें जरूरी दस्तावेज न जमा करने पर वोटर का नाम स्वतः ही चुनावी सूची से हटा दिया जाता है। उनके मुताबिक यह गरीब, मुस्लिम, दलित और प्रवासी समुदायों को निशाना बनाता है।

दस्तावेज़ों की बाध्यता और मताधिकार का संकट

चुनाव आयोग ने SIR में मतदाताओं को 30 दिनों की अवधि दी है, जिसमें उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 11 खास दस्तावेज़ जमा करने होंगे। लेकिन इनमें आधार कार्ड, ECI फोटो पहचान पत्र या राशन कार्ड जैसी आसानी से उपलब्ध पहचान पत्र शामिल नहीं हैं। इससे कई मतदाता, खासकर गरीब और पिछड़े वर्ग के लोग, अपने नाम मतदाता सूची में बनाए रखने में असमर्थ हो सकते हैं।

ऐसे में, यह संशोधन प्रक्रिया कई मतदाताओं के संवैधानिक वोट देने के अधिकार को खतरे में डाल सकती है, जिससे उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।

चुनाव आयोग का रुख और उसकी दलीलें

चुनाव आयोग ने 24 जून को SIR की प्रक्रिया की घोषणा करते हुए कहा था कि यह जरूरी है क्योंकि तेज़ शहरीकरण, माइग्रेशन, नए वोटर, मृत्यु की सूचनाओं का न आना और गैर-कानूनी प्रवासियों के नाम चुनावी रोल में आने जैसे मुद्दे बढ़ रहे हैं। इसलिए चुनावी सूची को साफ और अपडेट रखना आवश्यक है।

उनका मानना है कि इससे चुनाव प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष होगी और वास्तविक मतदाताओं को वोट देने का अधिकार मिलेगा।

राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ में SIR प्रक्रिया की चुनौती

चुनाव में मतदाता सूची का संशोधन एक संवेदनशील प्रक्रिया होती है, क्योंकि इसका असर सीधे लोकतांत्रिक अधिकारों पर पड़ता है। जब यह संशोधन चुनाव के करीब होता है, तो राजनीतिक दल इसे अपनी-अपनी रणनीति के अनुसार देखकर या आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं।

बिहार और पश्चिम बंगाल की स्थिति खासकर महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों राज्यों में चुनाव नजदीक हैं और यहां की राजनीतिक पार्टियां इस प्रक्रिया को अपने फायदे-नुकसान के नजरिए से देख रही हैं। विपक्ष SIR को मतदाताओं की आवाज़ दबाने वाला हथियार मान रहा है, जबकि चुनाव आयोग इसे चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता के लिए जरूरी कदम।

चुनाव की निष्पक्षता और सही प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए चुनावी रोल का अपडेट रहना आवश्यक है। लेकिन यह भी जरूरी है कि संशोधन प्रक्रिया में मतदाताओं को उनके अधिकारों से वंचित न किया जाए। खासतौर पर कमजोर वर्गों, अल्पसंख्यकों और प्रवासी समुदायों को इससे किसी भी प्रकार की परेशानी न हो।

पश्चिम बंगाल की 2022 की SIR की जानकारी सार्वजनिक करना और बिहार में इस तरह की प्रक्रिया को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, वह भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को दर्शाता है। इसमें पारदर्शिता, संवेदनशीलता और राजनीतिक समझदारी की जरूरत है।

आगे देखना होगा कि चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को किस तरह पूरा करता है और सभी वर्गों को न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व देता है या नहीं। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब हर नागरिक का वोट सुरक्षित और सम्मानित महसूस हो।

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