अपरिहार्य परिवर्तन: बंगाल में SIR डेटा रिहाई और उसकी राजनीतिक गूंज 🎯
चुनावों से पहले मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया राजनीतिक दृष्टिकोण से हमेशा विवादास्पद रही है, विशेषकर जब उसमें Special Intensive Revision (SIR) जैसी व्यापक छानबीन शामिल हो। हाल ही में, लोकसभा निर्वाचन आयोग (ECI) ने बंगाल में आखिरी बार लाई गई SIR (2002) का डेटा जारी किया है, जो कई राजनीतिक और सामाजिक बहसों को जन्म दे रहा है।
इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे:
- बंगाल में SIR डेटा की प्रस्तुति और पृष्ठभूमि
- बिहार की SIR प्रक्रिया और उससे उठी चुनावी न्याय लौंगी
- ममता बनर्जी और TMC की सशक्त आपत्ति और रणनीति
- विपक्षी दलों एवं सुप्रीम कोर्ट में उठे कानूनी प्रश्न
- चुनाव से पहले चुनाव आयोग की तैयारी और संभावित आगे की रणनीति
- नागरिक अधिकार, मतदाता वंचना और लोकतंत्र पर प्रभाव
1. बंगाल में SIR डेटा की प्रस्तुति और पृष्ठभूमि
ECI ने हाल ही में पश्चिम बंगाल की वेबसाइट पर “Electoral Roll of SIR 2002” शीर्षक के अंतर्गत 23 साल पुराना डेटा प्रकाशित किया है, जिसमें 11 जिलों के 109 विधानसभा क्षेत्रों की जानकारी शामिल है (India Today, The Statesman, The Times of India)। ये क्षेत्र हैं: Cooch Behar, Jalpaiguri, Darjeeling, Uttar Dinajpur, Dakshin Dinajpur, Malda, Nadia, Howrah, Hooghly, Medinipur, Bankura (India Today)।
पॉलिटिकल विश्लेषकों की मानें तो इस डेटा की रिहाई बंगाल में संभावित नए SIR की तैयारी की दिशा में पहला झलक है, खासकर 2026 विधानसभा चुनाव की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए (India Today, India Today, The Economic Times)।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि यह एक नियमित प्रक्रिया है, जिसमें मंसे राजनैतिक दलों और निर्वाचन अधिकारियों की “routine training” भी हो रही है (biharconnect.in)। डेटाबेस की समीक्षा, ARO कॉलिंग, और डिजिटलीकरण की तैयारी जैसे कदम जारी हैं (The Times of India)।
2. बिहार SIR प्रक्रिया और चुनावी विवाद
बिहार में 24 जून 2025 को शुरू हुई SIR प्रक्रिया ने देश भर में बहस छेड़ दी। इसमें लगभग 7.9 करोड़ मतदाताओं की सूची से 95.92% form प्राप्त किए गए, जिससे लगभग 7.15 करोड़ form digitize हुए हैं (Study IQ Education)।
इस प्रक्रिया में मृत्यु, प्रवासन, दोहरी पंजीकरण इत्यादि चलते करीब 5.27% मतदाता संदिग्ध बताये जाने लगे, जिसमें:
- मृत्युप्राप्त — 1.81%
- स्थायी प्रवासन — 2.5%
- दोहरी पंजीकरण — 0.95%
- अज्ञात — 0.01%
(Study IQ Education)
राजनीतिक दलों, विशेषकर कांग्रेस, TMC, RJD और AIMIM ने इसका विरोध करते हुए इसे मतदाता वंचना के रूप में बताया। उनका दावा है कि आधार, PAN या EPIC जैसे दस्तावेज को नागरिकता प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना, गरीब, मुस्लिम, दलित या प्रवासी समुदायों के वोट को हटा सकता है (India Today, biharconnect.in, Study IQ Education)।
TMC MP महुआ मोइत्रा, कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुके हैं, जिसमें इस प्रक्रिया को NRC जैसा कदम बताया गया है और कहा गया है कि नागरिकता प्रमाण दस्तावेज मांगना चुनाव आयोग की सीमित संवैधानिक भूमिका से परे है (The Times of India)।
3. ममता बनर्जी और TMC की कड़ा विरोध
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ़ कहा है, “हम बंगाल में SIR की इजाजत नहीं देंगे” (The Times of India)। उन्होंने Booth Level Officers (BLOs) को निर्देश दिए हैं कि मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाने में कोई परेशानी न हो, विशेषकर तब तक जब तक चुनाव तिथि घोषित नहीं होती (The Statesman)।
TMC ने बिहार में SIR को NRC जैसे कदम बताते हुए इसे राज्य के मतदाताओं को “पागलपन” जैसा बताया—“SIR मतदाता वंचना की नीयत से” (India Today, biharconnect.in, The Economic Times)।
TMC सांसद सुष्मिता देव ने यह भी कहा कि आयोग का नागरिकता सत्यापन (जैसे जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के दस्तावेज) नागरिकता अधिनियम की धारा 3 जैसा दिखता है, जो चुनाव आयोग का क्षेत्र नहीं है: वह गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी है (The Times of India)।
4. विपक्षी दलों की कानूनी कार्रवाई और मांगें
महुआ मोइत्रा, TMC सांसद, ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर SIR को रोकने की मांग की है, हवाई-नागरिकता की मांग और मतदाताओं की सूची से स्वचालित बहिष्कार को उजागर करते हुए कहा कि इसमें “प्रक्रियात्मक सुरक्षा” नहीं है (The Times of India, biharconnect.in)।
कांग्रेस, RJD, CPI(M) और अन्य कई दलों ने जनसभा, लोकसभा विरोध, धरना–प्रदर्शन और परिधान-पूर्वक अभियानों का आयोजन कर SIR की प्रक्रिया को लोकतंत्र विरोधी बताया (The Times of India, The Times of India, The Times of India, The Economic Times)।
RJD के नेता तेजस्वी यादव ने आयोग को ‘भाजपा की सेल’ कहते हुए आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया गरीबों और अल्पसंख्यकों को वंचित कर सकती है (The Times of India)।
5. ECI की तैयारी और अगला चरण क्या होगा?
चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को घोषणा की कि पूरे देश में SIR चलाया जाएगा, ताकि मतदाता सूची साफ-सुथरी, विश्वसनीय, सटीक और अद्यतित रहे। इसका उद्देश्य तेजी से शहरीकरण, प्रवासन, प्रथम‑बार के मतदाता, मृतकों का नजदीकी से रिकॉर्ड न होना और बेग़ैर दस्तावेज वाले निवासियों की सूची से निकलना था (Study IQ Education, India Today, The Economic Times)।
ECI ने पहले से तय कर लिया है कि Form 6 और 8 (विषयनुसार पंजीकरण और नाम हटाने/स्थानांतरण के फॉर्म) में सुधार होंगे—to make uniform nationwide system, उपकरण और पहचान के लिए समरूप दस्तावेज़ सूची बनाए गए हैं (The Economic Times)।
विशेष रूप से, बंगाल में राज्य मशीनरी चयन, BLO नियुक्ति, new booth details, प्रशिक्षण आदि सब चल रहा है—जैसा कि August 2025 में SIR शरू होने की तैयारी बताई जा रही है, जो draft rolls को October‑end तक प्रकाशित करेगा, और जरूरत पड़ी तो नवंबर‑दिसंबर में summary revision की प्रक्रिया होगी (The Economic Times)।
6. मतदाता अधिकार, लोकतंत्र और निष्कर्ष
मतदाता सूची में नाम खराब होना या हट जाना, संविधानिक अधिकार का उल्लंघन है। इसके दायरे में अनेक सवाल खड़े होते हैं:
- क्या गरीब, प्रवासी, दलित, मुस्लिम समुदाय निवासी जो केवल आधार, ration card या EPIC रखते हैं—उनका हक छीना जा सकता है?
- क्या दस्तावेज़ सूची में शामिल birth certificates, parents‑based documents—मतदाता पहचान के लिए आदर्श हो सकते हैं?
- समाज के कमजोर वर्गों के लिए पर्याप्त समय और सुविधा दी गई है?
विरोध दलों का कहना है कि समय सिर्फ 3‑4 महीने की अवधि दी गई, जबकि पारंपरिक SIR में 6‑8 महीने का समय लगता है (India Today, biharconnect.in)।
चुनाव आयोग का यह कहना है कि यह प्रक्रिया लोकतंत्र की रक्षा, सूची की साफ़‑सफाई और नकली मतदाताओं को हटाने का औचित्य पर केंद्रित है। वहीं, विपक्ष इसे NRC‑sमान तथा नागरिकता सत्यापन तक से उलझा हुआ मान रहा है (biharconnect.in, Study IQ Education, The Times of India, The Times of India, The Economic Times)।
- बंगाल में 2002 SIR डेटा की रिहाई सीधे तौर पर 2026 विधानसभा चुनाव की तैयारी से जुड़ी प्रतीत होती है।
- बिहार SIR के अनुभवों से निहित मतदाता वंचना और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की गहरी पक्षपातपूर्ण बहस तेज़ हुई है।
- ममता बनर्जी और TMC ने SIR को रोकने के लिए BLOs, राज्य प्रशासन, सुप्रीम कोर्ट तक प्रयास संचालित किए हैं।
- चुनाव आयोग ने nationwide uniform प्रक्रिया, document templates और संपूर्ण प्रशिक्षण संगठित किया है।
- लोकतंत्र की रक्षा, पारदर्शिता और मतदाता सुरक्षा—इन मूल्यों के बीच संतुलन खोजने की चुनौती अब मुख्य राह बनी हुई है।
यह लेख इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि बंगाल जैसे संवेदनशील राजनैतिक परिवेश में, ऐसी चुनावी प्रक्रियाएँ सीधे तौर पर वोटिंग अधिकार, नागरिक भागीदारी, और लोकतांत्रिक विश्वास पर असर डालती हैं।
यदि आप चाहें, तो मैं आगे Form 6/8 में दस्तावेज़ सूची, supreme court hearings की तारीखें, या बिहार और बंगाल में मुख्यमंत्री के बयान—इन सब विषयों पर भी विश्लेषण दे सकता











