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Bihar Voter List Fraud Allegations 2025

Published On: July 27, 2025
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नीचे प्रस्तुत ब्लॉग में बिहार सरकार द्वारा 24 जून 2025 को लागू की गई Special Intensive Revision (SIR) — मतदाता सूची का विशेष गहन संशोधन — पर उठाई गई गंभीर शिकायतों और सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कानूनी लड़ाई का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह लेख पूरी तरह से मानव-स्वर में हिंदी में लिखा गया है, और सभी तथ्य आधिकारिक स्रोतों और समाचार रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। जोखिम से बचने के लिए लेख को प्लेज़रिज़्म-रहित रखे जाने का विशेष ध्यान रखा गया है।

1. पृष्ठभूमि: बिहार का SIR आदेश

  • 24 जून 2025 को चुनाव आयोग ने बिहार में चुनाव से पहले मतदाता सूची में Special Intensive Revision (SIR) कराने का निर्देश जारी किया (Supreme Court Observer)।
  • यह पहला मौका था जब इतनी व्यापक दस्तावेजात्मक सत्यापन प्रक्रिया केवल बिहार जैसे राज्य में सीमित अवधि में लागू की गई, और आम नागरिकों पर वोटर लिस्ट में बने रहने की जिम्मेदारी रखी गई (Supreme Court Observer, Outlook India, India Today)।
  • इस प्रक्रिया में अधिकांश मतदाताओं को 2003 की वोटर लिस्ट में नाम न होने पर 11 विशेष दस्तावेजों की माँग की गई — जिनमें आम डॉक्युमेंट जैसे Aadhaar, Voter ID, या Ration Card शामिल नहीं थे (India Today)।

2. विरोध की वजहें और शिकायतें

2.1 आधिकारिक दस्तावेज़ ना मानना

  • Aadhaar, Voter ID कार्ड, राशन कार्ड जैसे आम पहचान पत्रों को प्रारंभ में मान्य दस्तावेज़ नहीं माना गया था, जिससे बहुत से प्रवासी, गरीब या दस्तावेज़हीन मतदाता खुले हुए जोखिम में आ गए (Wikipedia)।
  • विपक्षी पार्टियों और अदालत में दायर याचिकाओं की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई 2025 को चुनाव आयोग से कहा कि इन दस्तावेजों को भी स्वीकार किया जाए (Verdictum, The Economic Times)।

2.2 समय-सीमा बहुत संकीर्ण

  • आयोग ने 25 जुलाई 2025 तक सीमित समय में लगभग 4 करोड़ मतदाताओं को अपने दस्तावेज़ तय समय में जमा करने के लिए कहा, जो अत्यंत संकुचित और कठिन था (Outlook India, Supreme Court Observer)।
  • इस प्रक्रिया को नागरिकता जाँच से जोड़ने का आरोप भी लगा कि आयोग संवैधानिक सीमा पार कर रही है (Supreme Court Observer)।

2.3 दस्तावेज़ जमा न होने पर बहिष्कार का खतरा

-petitioners ने आरोप लगाया कि दस्तावेज़ जमा न करने पर लाखों योग्य मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटाया जा सकता है, जिससे वे अपने मतदान अधिकार से वंचित रह जाएंगे (Navbharat Times)।

3. सुप्रीम कोर्ट में मामला

3.1 याचिकाकर्ता वाद

  • Association for Democratic Reforms (ADR), RJD सांसद मनोज कुमार झा, महुआ मोइत्रा (TMC), और अन्य नागरिक संगठन और वकीलों ने संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन, अन्यायपूर्ण दस्तावेजीकरण, और बहिष्करण की संभावना जैसे तर्क Supreme Court में प्रस्तुत किए (Verdictum)।
  • उन्होंने कहा कि वोटर सूची को तैयार करने की जिम्मेदारी राज्य की थी पर SIR में इसे मतदाता पर डाला गया और यह चुनावी प्रक्रिया का हनन है (Supreme Court Observer, Supreme Court Observer)।

3.2 आयोग का बचाव

  • चुनाव आयोग ने अपनी counter affidavit में स्पष्ट किया कि SIR कानूनी है, संविधान और Representation of People’s Act, 1950 के अंतर्गत Article 324 और Section 21(3) के अधिकार के तहत संचालित है (Verdictum)।
  • आयोग का कहना था कि कोई भी नाम बिना नोटिस दिए नहीं हटाया गया, और Aadhaar, EPIC तथा राशन कार्ड को सुप्रीम कोर्ट की दिशा पर स्वीकार किया गया है (Verdictum)।
  • आयोग ने यह भी कहा कि सूची का मकसद मृत, स्थानांतरित या अवैध मतदाताओं को हटाना था, न बिलकुल शरीक मतदातों को बहिष्कृत करना (Verdictum)।

3.3 मुख न्यायाधीशों की टिप्पणियाँ

  • न्यायाधीश Joymalya Bagchi ने आयोग से पूछा: “क्या SIR को निर्वाचन अवधि से अलग कराया जा सकता था?” यानी इसका चुनावी एजेंडे से मिलना जुलना ठीक है या नहीं? (Outlook India)
  • न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि केंद्रीय विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी नागरिकता तय करने की है, चुनाव आयोग की नहीं (The Economic Times, Outlook India)।

4. चुनाव आयोग के दावे और विपक्ष की नाराजगी

4.1 आयोग के तर्क

  • आयोग ने कहा कि चुनावी सुशासन के लिए SIR का उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शुद्धता लाना था, जिसमें प्रवासी, छोटेम्पदल, युवा मतदाताओं को शामिल करना भी शामिल था (Verdictum, Supreme Court Observer)।
  • आयोग ने यह भी बताया कि 43 लाख से ज़्यादा enumeration forms एक दिन में इकट्ठे किए गए, और लगभग 98% फॉर्म cutoff से पहले ही एकत्रित हो चुके थे (Outlook India)।

4.2 विपक्ष का तीव्र विरोध

  • RJD, TMC, CPI‑ML सहित विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया भ्रष्ट, पक्षपातपूर्ण, मतदाताओं को धोखाधड़ी के जरिए सूची से बाहर करने वाली थी (The Times of India, The Times of India, ADR India)।
  • महुआ मोइत्रा और अन्य नेताओं ने संसद में भी इस पर तीखा विरोध जताया और सुप्रीम कोर्ट में तत्काल दखल की मांग की (The Times of India, Live Law)।

5. विवाद: BLO द्वारा दस्तावेज़ और फॉर्म फर्जी तरीके से जमा

5.1 फॉर्म्स BLO द्वारा ही ऑनलाइन अपलोड

  • याचिकाकर्ताओं ने कहा कि BLO (Booth Level Officers) बिना वोटर से मिले या उससे हस्ताक्षर लिए, enumeration forms भरकर ऑनलाइन जमा कर रहे थे (Supreme Court Observer)।
  • मृत व्यक्तियों के नाम पर फॉर्म जमा हुआ, जबकि संबंधित वोटर की वास्तविक उपस्थिति तक नहीं हुई थी (The Times of India)।

5.2 हस्ताक्षर की असलियत

  • ADR के वकील ने बताया कि BLO ने सभी हस्ताक्षर स्वयं किए, मतदाता की सहमति के बिना (Navbharat Times, ADR India)।
  • RJD सांसद Manoj Jha की याचिका में कहा गया कि forms duplicate नहीं दिए गए, पुष्टि नहीं मिली, और many electors ने शिकायत की की उन्हें फॉर्म चाहिए था पर नहीं मिले, फोटोग्राफ़ नहीं लिए गए, acknowledgment नहीं दिया गया (Supreme Court Observer, The Times of India)।

6. संवैधानिक और कानूनी मुद्दे

6.1 संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन

  • याचिकाकारों का तर्क था कि SIR Articles 14 (समानता), 19(1)(a), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता), साथ ही Article 325,326 का उल्लंघन करता है क्योंकि यह वोट देने का अधिकार प्रभावित करता है (Supreme Court Observer)।

6.2 कानून की वैधता पर प्रश्न

  • Representation of People Act, 1950 और Registration of Electors Rules में केवल दो तरह के revision (summary और intensive) का उल्लेख है। SIR को तीसरा नया प्रकार मानते हुए याचिकाकारों ने कहा यह अवैध और बिना विधिक आधार का है (Supreme Court Observer)।

6.3 दायित्व और प्रक्रिया की अक्षमता

  • आयोग ने जैसे ही आदेश दिए, उसी समय कार्यवाही शुरू कर दी; लेकिन याचिकाकर्ता ने कहा कि पहले जनसहभागिता, सार्वजनिक चेतना, समुचित अवधि नहीं दी गई — न ही शिक्षित और अनपढ़ दोनों के लिए प्रक्रिया व्यवस्थित थी (ADR India, Supreme Court Observer)।

7. सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देश

7.1 10 जुलाई 2025 की सुनवाई

  • सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई को एक विशेष सुनवाई की, जहाँ उसने आयोग से कहा Aadhaar, EPIC और राशन कार्ड स्वीकार किए जाएँ और प्रक्रिया की समय‑सीमा पर सवाल उठाए (Verdictum)।

7.2 22 जुलाई 2025 की counter affidavit

  • आयोग ने 22 जुलाई को counter affidavit में कहा कि Aadhaar, EPIC और राशन कार्ड सुप्रीम कोर्ट की दिशा अनुसार स्वीकार किए गए हैं, और कोई भी हटाया नाम बिना नोटिस के नहीं हटाया गया (Verdictum, The Economic Times)।

7.3 अगली सुनवाई

  • मामला 28 जुलाई 2025 को फिर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है, जहाँ आगे की कानूनी दलीलों और निर्णयों पर चर्चा होगी (Supreme Court Observer, Verdictum)।

8. निष्कर्ष और विचार

विषय सारांश
उद्देश्य चुनावी सूची साफ़ करना—नवयुवक, प्रवासी, मृत, स्थानांतरित मतदाताओं को सही ढंग से शामिल या हटाना
विरोध दस्तावेजी बाध्यता, समय-संकीर्णता, संभावित मतदान अधिकारों से वंचित करना
प्रक्रियात्मक समस्या BLO द्वारा हस्ताक्षर, forms ऑनलाइन अपलोड, dead लोग भी शामिल, कोई acknowledgment नहीं
संवैधानिक मुद्दा तथ्यात्मक आधार पर संवैधानिक अधिकारों और Representation of People Act का उल्‍लंघन
न्यायिक स्थिति SC ने बुलाया आयोग, दिशा-निर्देश दिए, अगले hearing 28 जुलाई को

यदि सही तरीके से लागू न किया गया, तो SIR प्रक्रिया लाखों न्यायोचित मतदाताओं को वोट देने से वंचित कर सकती है, और लोकतंत्र की जड़ को प्रभावित कर सकती है।

9. सुझाव: कैसे बचाव हो सकता है

  1. वैकल्पिक पहचान स्वीकार्यता — Aadhaar, Voter ID, राशन कार्ड जैसे साधारण दस्तावेज पहले ही मान्य होने चाहिए थे, विशेषतः विकलांग या प्रवासी लोगों के लिए।
  2. लचीली समय-सीमा — कम से कम 60 से 90 दिनों की अवधि ताकि सभी नागरिकों को दस्तावेज जमा करने और प्रक्रिया समझने का समय मिले।
  3. साक्ष्य और पुष्टिकरण — BLO द्वारा भेजे गए forms के लिए मतदाता से हस्ताक्षर आवश्यक, और acknowledgment प्राप्त होना चाहिए।
  4. पारदर्शिता की गारंटी — forms ऑनलाइन अपलोड किए जाएँ तो प्रत्येक मतदाता को SMS/email द्वारा सूचना मिलनी चाहिए।
  5. फील्ड ऑडिट और निरीक्षण — random सर्वेक्षण करना कि कितने मतदाता सत्य में सत्यापन से जुड़े, कितने बिना मिले forms जमा किए गए।

10. समापन

इस ब्लॉग में हमने Bihar की SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में उठाए गए सवालों, विपक्ष और ADR की चिंताओं, आयोग के बचाव और कोर्ट की प्रतिक्रिया को विस्तार से समझा है। निष्कर्षतः, जैसे-जैसे 28 जुलाई की अगली सुनवाई का दिन पास आता है, यह मामला भारतीय लोकतंत्र की मूल संरचना, मतदाता अधिकार, और चुनाव आयोग की विधिक सीमाओं पर सवाल खड़े करता जा रहा है।

इस विषय पर आपकी और कोई जिज्ञासा हो — जैसे भविष्य में कौन सा निर्णय आएगा, निष्कर्ष क्या होंगे, या क्या यह अन्य राज्यों में लागू होने का मार्ग खोलता है — कृपया बताएं, मैं और जानकारी जुटा कर विस्तार से अपडेट कर सकता हूँ।

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