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Dhankhar’s Resignation Sparks BJP’s Ideological Reset

Published On: July 27, 2025
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उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे से भाजपा में विचारधारा का भूचाल

प्रस्तावना

21 जुलाई 2025 को, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक स्वास्थ्य संबंधी औपचारिकताओं को कारण बताकर अपना पद छोड़ दिया। भारतीय राजनीति में उपराष्ट्रपति की आधा-अधूरी इम्तिहानी रिहर्सल शायद पहली बार हुआ हो। पर इस व्यक्तिगत निर्णय की गूँज भाजपा की विचारधारा, संगठन और सामंजस्य में हलचलों का कारण बनी है। इस लेख में हम इसके गहरे राजनीतिक मायने, पार्टी में उम्र‑सीमा की अनौपचारिक नीति और आने वाले समय में संभावित नेतृत्व परिवर्तन को समझने का प्रयास करेंगे। (Navbharat Times)

1. इस्तीफे के स्वरूप की असमंजसपूर्ण प्रकृति

धनखड़ ने “स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने” का हवाला देकर इस्तीफा दिया, लेकिन कई स्रोतों में यह स्पष्ट है कि स्वास्थ्य समस्या सर्वोच्च कारण नहीं थी। अपने पद की आधिकारिक भूमिका में वह सक्रिय बने रहे—लेकिन अचानक उनका इस्तीफा किस संकट या दबाव में सामने आया, यह स्पष्ट नहीं रहा। राजनीतिक दलों और विपक्ष ने इसे ज़्यादा गहराई से समझने की मांग की। (Wikipedia, The Week, The Week, Medium)

राहुल गहलोत जैसे राजनीतिक हस्तियों ने सुझाव दिया कि इस इस्तीफे के पीछे गहरा दबाव था—न्यायपालिका और सांसदों पर उनकी कुछ टिप्पणियाँ भाजपा नेतृत्व को नागवार लगीं। राजस्थान से कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे “antifarmer और anti‑Jat निर्णय” कहा, और गहलोत ने कहा कि RSS और BJP सत्ता‑मानस शैडो में हैं और दबाव बना चुके थे। (The Times of India)

बहरहाल, प्रधान मंत्री ने सोशल मीडिया पर मात्र “शुभ स्वास्थ्य” की प्रार्थना वाले त्वरित संदेश से काम चला दिया—जो एक राजनैतिक शून्यता जैसा प्रतीत हुआ। औपचारिक भावुकता या प्रशंसा का अभाव इस चर्चा में चरमोत्कर्ष देता है कि इस्तीफा किसी औपचारिक समर्पण की तरह न होकर राजनीतिक सजा जैसा था। (India Today, The Week)

2. उम्र‑सीमा की अनौपचारिक नीति: 75 वर्ष की ओहदा कट‑ऑफ

मोहान भागवत ने 75 वर्ष तक कार्यकाल की अनौपचारिक “आयु नियम” पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि 75 की उम्र पार करने पर नेताओं को मार्ग देना चाहिए। (DNP India, The New Indian Express, The Economic Times)

धनखड़ मई 2025 में 74 वर्ष के हुए थे, और इस नियम के तहत उन्हें स्वयं इस्तीफा देना पड़ा। जबकि आधिकारिक तौर पर कोई लिखित नियम नहीं है—बीजेपी संविधान में उम्र‑सीमा का उल्लेख नहीं है—इस नियम का स्वरूप एक प्रकार से पार्टी के भीतर अनुभव और नवीकरण के बीच संतुलन रखने की रणनीति बन गया है। (The Tribune, The New Indian Express)

लगातार 2014 के बाद यह नीति लागू होती दिखी—पूर्व दिनों में LK अडवाणी, M Manohar Joshi जैसे वरिष्ठ नेता सम्मानपूर्वक हटाए गए, जिससे नए नेतृत्व को मंच मिलता चला गया। यह “75‑रूल” नेतृत्व रूपांतरण और अनुशासन का प्रतीक बन चुका है। (The New Indian Express)

इस नीति की चयनात्मक लागू होने पर भी विवाद खड़ा हुआ—क्योंकि मोदी और भागवत स्वयं 75 को पार कर चुके हैं, फिर भी उनसे कोई संदेह नहीं किया गया। जबकि दंपक्षीय कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता इससे बेदखल होते रहे। इसके कारण ऐसी अटकलें और असंतोष जन्म लिया कि यह नियम केवल कुछ को हाशिये पर करने और कुछ को आगे लाने का साधन बन रहा है। (The New Indian Express, DNP India, The Tribune, Reddit)

3. संगठनों में बदलाव और नेतृत्व का विस्तार

धनखड़ के इस्तीफे के साथ ही भाजपा में व्यापक फेरबदल की संभावनाएं उभर कर सामने आईं। पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर भी चंचलता बनी हुई है—JP नड्डा की अध्यक्षता 2024 के बाद बढ़ाई गयी, जिससे संगठन में नई आक्रामकता और ताज़गी की कमी महसूस की जा रही थी। (The New Indian Express, The Economic Times)

विशेषज्ञों का कहना है कि अब एक नया उपराष्ट्रपति और पार्टी अध्यक्ष दोनों चुनने की ज़रूरत है, जिनमें भाजपा और RSS की विचारधारा का अनुशासन और लोक‑लुभावन नेतृत्व दोनों हों। राजनाथ सिंह जैसे RSS‑साल्वक नेता को वीपी पद के लिए संभावित माना जा रहा है। (The New Indian Express, The Economic Times)

यदि सचमुच राजनाथ सिंह जैसे किसी का चयन होता है, तो मंत्रिमंडल में भी व्यापक परिवर्तन संभव है—पांच वर्ष से अधिक समय से पद पर बने अधिकारियों को हटाकर नए, कार्यशील चेहरे लाए जा सकते हैं। इससे प्रधानमंत्री मोदी की कई महत्वाकांक्षी योजनाओं जैसे “एक राष्ट्र‑एक चुनाव”, आर्थिक पुनरुध्दार, द्वारिक शासन आदि को गति मिल सकती है। (The New Indian Express, The Economic Times, The Economic Times)

इसी संवाद में, बड़े नेताओं के चुनावों, संगठनात्मक पदों और राज्य नेतृत्वों में बदलाव की राजनीति गरम हो रही है। योगी आदित्यनाथ और देवेंद्र फडणवीस जैसे नेताओं को अग्रिम मोर्चे पर देखे जाने की संभावना बन रही है, क्योंकि वे हिंदुत्व‑खड़ा नेतृत्व मॉडल में फिट रहते हैं। (The New Indian Express, DNP India)

4. जातीय राजनीति और Jat समुदाय की प्रतिक्रिया

धनखड़ राजस्थान के जाट समुदाय से आते हैं—इस समुदाय में उनकी लोकप्रियता जनाधार से जुड़ी रही है। उनकी ओरदारी से BJP को पश्चिमी राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में जाट वोटों की साख बनती आई। (The Times of India)

पर इस्तीफे के बाद इस समुदाय में असंतोष उभरा। राजस्थान के जाट महासभा और अन्य OBC संगठन इसे भाजपा की ‘उपयोग करें‑फेंक दें’ नीति का हिस्सा मान रहे हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा ने धनखड़ का इस्तेमाल जाट समर्थन जुटाने में किया और ज़रूरत पूरी होते ही उन्हें किनारे कर दिया। (The Times of India)

2024 के लोकसभा चुनावों में जाट क्षेत्रों जैसे सीकर, झुंझुनू, नागौर, चुरू से BJP को भारी झटका लगा—इनमें कांग्रेस को सफलता मिली। यह दिखाता है कि इस सामाज‑राजनीतिक संदेह और नेतृत्व‑खोलापन ने वफादारी को बाँधने में BJP को पटरी से उतार दिया। (The Times of India)

5. संसद‑रियायत और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति दृष्टिकोण

धनखड़ के इस्तीफे की टाइमिंग—मानसून सत्र की शुरुआत पर—लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति BJP रवैए पर सवाल खड़े करते हैं। झारखंड गठबंधन ने केंद्र सरकार से स्पष्ट स्पष्टीकरण की मांग की कि धनखड़ संसद का संचालन किस दबाव में छोड़ गए। उनका आरोप था कि राज्य सभा में संसदीय चर्चाओं का फोकस सेना अभियानों की बजाय बंदरगाह निजीकरण, पार्टी हितों और व्यापारिक एजेंडों पर लगाया गया, जिन्हें लेकर वे असहज थे। (The Times of India)

विवेक टांका और अन्य विपक्षी नेताओं ने कहा कि लगता है पीएम और सरकार ने व्यक्तिगत रूप से इस्तीफे की घटना को नियंत्रित किया, और यह लोकतंत्र की संस्थागत स्वतंत्रता के लिए खतरनाक संकेत है। (India Today, Medium, The Week)

6. विरोध और राजनीतिक रणनीति

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस घटना को “धक्का बोल रहा है” मानते हुए जोरदार हमला बोला। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि मोदी का X पर मौन ही संदेश था—और इस्तीफे की रहस्यमयी प्रकृति को और भ्रूमूल्य बना गया। (The Week)

झारखंड गठबंधन ने इस बदलाव को सांसदों के बहिष्कार, घरेलू बैठक में आदर्शों की टकराव और सरकार द्वारा लोकतांत्रिक संस्थाओं को असह्य दबाव में डालने की प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया। (The Times of India, Medium, The Week)

राजस्थान में अशोक गहलोत ने स्पष्ट कहा कि RSS और BJP की साजिश स्पष्ट थी—धनखड़ को हटाया गया क्योंकि उन्होंने कृषि और न्यायपालिका पर उनकी हरकतों की आलोचना की थी। (The Times of India)

7. भाजपा‑RSS विचारधारा में पुनर्संयोजन

राम‑मंदिर, अनुच्छेद 370 रद्दीकरण, एक राष्ट्र‑एक चुनाव जैसे ऐतिहासिक अभियानों के बाद BJP कमजोर electorally हुई—2024 चुनाव में मात्र 240 सीटें मिलीं। इससे पता चलता है कि BJP की संप्रभुता अब NDA सहयोगियों पर निर्भर हो चली है, जिससे विचारधारा में अस्पष्टता बढ़ी। (The New Indian Express, The Economic Times, The Economic Times)

यहां RSS की भूमिका महत्वपूर्ण है। RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा के अलोकतांत्रिक ढाँचे, जात‑कट्टर नेता चयन और व्यक्तिगत प्रभुत्व को चुनौती दी है। उन्होंने दोहराया है कि अगला अध्याय भाजपा का नेतृत्व अनुशासन, सिद्धांत और वर्ग‑साधारण विश्वास से संचालित होना चाहिए। Dhankhar के इस्तीफे ने RSS की यह पुकार और तर्क स्पष्ट किया कि केवल लोयल्टी नहीं, बल्कि विचारधारात्मक सच्चाई महत्वपूर्ण होनी चाहिए। (The New Indian Express, DNP India)

8. आगे की राह: कार्यनीति, नेतृत्व और 2029 तक का सफर

धनखड़ की अचानक विदाई ने एक तरह से भाजपा को संरचनात्मक अंदाज से दो विकल्प दिए: या तो विचारधारा की कसौटी पर काम करना या फिर सत्ता‑संरचना में तर्क‑रहित नमी लेकर अपना पतन स्वयं बुलाना। अगले पांच सालों में लगभग एक दर्जन राज्यों में चुनाव होने हैं—इससे प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा और RSS की रणनीति की स्थिरता और परिणाम दोनों तय होंगे। (The New Indian Express, The Economic Times, The Economic Times, DNP India)

Yogi Adityanath और Devendra Fadnavis जैसे नेता अपेक्षित अग्रिम मोर्चे पर देखने को मिल सकते हैं—जो संगठित रूप से RSS‑विचारदर्शी नेतृत्व की अपेक्षा पर खरे उतरेंगे। वहीं, संगठन परिवर्तन में भी नई युवा नेतृत्व, ताजगी और प्रदर्शन‑प्रमुख नीतियों को जगह मिलना चाहिए। (The New Indian Express)

कुल मिलाकर, भाजपा का यह दौर—धनखड़ की विदाई और उसके बाद की हलचल—एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है: फिर से मूलयादी विचारधारा पर वापस लौटें या सत्ता की राजनीति में बहाव के साथ ख़तरे को चुने। 🧭

उपसंहार

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा किसी स्वास्थ्य समस्या से प्रेरित कथित समर्पण नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित राजनीतिक प्रक्रिया का प्रतीक प्रतीत होता है। भाजपा के भीतर उम्र‑सीमा, नेतृत्व परिवर्तन, विचारधारा‑संगठन संतुलन और संवैधानिक संस्थानों के प्रति दृष्टिकोण सभी सवालों का केंद्र बन गए हैं। अब समय आ गया है कि भाजपा यह तय करे—क्या वह फिर से सिद्धांतों पर लौटेगी या हर चुनाव में नई सत्ता‑खोज घटाएगी?

यदि संगठनात्मक पुनर्गठन, वैचारिक स्पष्टता और लोक‑विश्वास को प्राथमिकता दी गई, तो भाजपा 2029 से आगे भी शासन की दौड़ में बनी रह सकती है। अन्यथा, यह सिर्फ एक पार्टी रह जाएगी जो सत्ता की राजनीति के साथ हरियाली खींचती जाएगी—बिना किसी दिशा, बिना किसी ध्रुव और अंततः, बहाव के बीच धूमिल होती।

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