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EC vs Rahul Gandhi: Voter Fraud Allegations Spark Affidavit Row

Published On: August 12, 2025
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मुख्य बिंदु और संदर्भ

  • राहुल गांधी के वोट-चोरी और मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप, और उनसे सत्यापन हेतु चुनाव आयोग द्वारा शपथ-पत्र (affidavit) माँगा जाना (The Economic Times)।

  • राहुल गांधी का प्रतिक्रिया स्वरूप कहना कि उन्होंने संविधान की शपथ संसद में ली है, इसलिए अतिरिक्त शपथ की ज़रूरत नहीं (The Economic Times, Outlook India)।

  • चुनाव आयोग का दावा कि राहुल गांधी के आरोप पुराने हैं, सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले निराकृत किए गए मसलों की तरह देखने पर शर्मिन्दगी जैसी स्थिति बनी है (Moneycontrol)।

  • राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आयोग की मांग को “बेहद हास्यास्पद (utterly absurd)” बताया—उन्होंने सवाल उठाया कि पहले भी बड़े नेता आरोप लगा चुके हैं पर उनसे शपथ क्यों नहीं माँगा गया (The Times of India)।

  • कर्नाटक के विधि मंत्री एच.के. पाटिल ने चुनाव आयोग से आग्रह किया कि राहुल गांधी के आरोपों को स्वक्रिय (suo motu) मामला मानकर जांच की जाए (The Times of India)।

  • उत्तर प्रदेश में, अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग पर मुस्लिम-पावर वोटरों के नाम हटाने का आरोप लगाते हुए, चुनाव आयोग से कार्रवाई की मांग की—उनका कहना था कि कांग्रेस ने पहले ही शपथ-पत्र दे रखा है, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई (The Times of India)।

  • भाजपा ने राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए कहा कि अगर उनको आयोग पर भरोसा नहीं है, तो लोकसभा से इस्तीफा दे देना चाहिए—यहोनैतिक तौर पर उनकी जिम्मेदारी है (The Times of India)।

“क्या मात्र एक शपथ-पत्र मांगना ही पर्याप्त जवाब है?”

परिप्रेक्ष्य: आरोप, जवाब और लोकतंत्र पर सवाल

1. आरोप की शुरुआत

हाल ही में, राहुल गांधी ने बंगलौर (मैहादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र) में वोट‑चोरी और मतदाता सूची में गड़बड़ी का खुलासा किया। कांग्रेस की ओर से पेश डेटा के अनुसार, महज एक विधानसभा क्षेत्र में:

  • दोगुने दर्ज मतदाता,

  • नकली या अमान्य पतों वाले हजारों मतदाता,

  • फॉर्म‑6 का दुरूपयोग,

  • अवैध फोटो-युक्त मतदाताओं की भीड़—

इत्यादि जैसे कई गंभीर विसंगतियाँ थीं। कांग्रेस ने दावा किया कि यह मॉडल भारत के अन्य हिस्सों में भी हो रहा है और यह “संविधान और लोकतंत्र के साथ बड़ा धोखा” है। (Outlook India, The New Indian Express)

2. आयोग की प्रतिक्रिया

इन आरोपों के जवाब में, चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के पास शपथ-पत्र (affidavit) भेजा। यह दस्तावेज़ उन्हें Rule 20(3)(b) के अंतर्गत देना था—जिसमें यह सत्यापित करना था कि वह आरोप “अपनी सबसे अच्छी जानकारी और विश्वास के अनुसार” सही हैं। आयोग ने चेतावनी दी कि यदि यह गलत निकला, तो धाराओं 227/229 (भारतीय न्याय संहिता) तथा Representation of the People Act की धाराओं के तहत कानूनी कार्रवाई हो सकती है। (The Economic Times, The Times of India)

3. राजनीतिक और वैचारिक प्रतिक्रियाएँ

  • राहुल गांधी ने सीधे जवाब दिया: “मैंने संविधान की शपथ संसद में ली है — मेरी जुबान ही मेरी शपथ है।” इसके अलावा, उन्होंने कहा कि आयोग को सत्यापन और जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु वोटर सूची और वीडियो रिकॉर्डिशन उपलब्ध कराना चाहिए। (The Economic Times, Outlook India)

  • ऑर्थर और विपक्ष के कई नेता—जैसे अशोक गहलोत—ने कहा कि यह “बेहद हास्यास्पद” है; पहले भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं लेकिन शपथ-पत्र की मांग नहीं की गई। उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग की। (The Times of India)

  • कर्नाटक विधायक एच.के. पाटिल ने चुनाव आयोग से स्व‑क्रिय (suo motu) रूप में मामले की जांच का आग्रह किया, ताकि आरोपों का स्वतः ही विश्लेषण हो सके। (The Times of India)

  • अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में 18,000 मतदाताओं के “अन्यायपूर्ण हटाव” का मामला उठा कर आंदोलन किया और कहा कि पहले ही शपथ-पत्र दे दिया गया था, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। (The Times of India)

  • भाजपा ने कहा कि अगर राहुल गांधी आयोग पर भरोसा नहीं रखते, तो उन्हें नैतिक तौर पर लोकसभा से छोड़ देना चाहिए। यह बयान राजनीतिक दबाव का प्रतीक है। (The Times of India)

4. क्या आयोग का रवैया लोकतंत्र के अनुरूप है?

विशेषज्ञों का मानना है:

  • लॉक्रिस्ट लोकसभा सचिवालय के पूर्व सेक्रेटरी PDT आचार्य ने कहा कि नियम 20(3)(b) केवल प्रारंभिक ड्राफ्ट रोल्स के समय ही प्रासंगिक है। जब भी कोई नागरिक जब चाहे शिकायत कर सकता है, आयोग को पूरी व्याख्या देनी चाहिए—पर ऐसा करना संविधान (अनुच्छेद 324) की भावना के अनुरूप ही माना जाएगा।

  • पत्रकार पूनम अग्रवाल ने तर्क दिया कि आयोग नियमों में ही उलझा हुआ दिखता है; वह लेन-देन की बजाय तुरंत जवाब या जांच शुरू कर सकता था। विपक्षी नेता के लिए लाखों मतदाताओं पर शपथ-पत्र आपत्ति सफल नहीं है।

  • पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी टीका राम मीणा ने बताया कि राजनीतिक दलों के पास ड्राफ्ट रोल्स पर आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त समय होता है; उस समय नहीं उठाना उनकी गलती हो सकती है।

लोकतंत्र, जवाबदेही और भरोसा

यह विवाद सिर्फ कोई तकनीकी मामला नहीं है—यह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा और राजनीतिक जवाबदेही का भी परीक्षा‑ख़ाना है।

  • क्या आयोग के लिए जवाबदेही और स्पष्टता आवश्यक नहीं है—खास तौर पर तब जब सार्वजनिक विधिवत सवाल उठता हो?

  • क्या एक विपक्षी नेता से शपथ-पत्र माँगने का निर्णय लोकतंत्र की भावना से मेल खाता है, या यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को रोकता है?

  • और क्या आरोप—भले ही भारी प्रतीत हों—उनके आधार पर न्यायिक जांच, लोकल स्तर पर शिकायत दायर करना या सीधा आयोग‑स्तरीय जवाब अपेक्षित नहीं थी?

अंततः यह मामला यह तय करेगा कि लोकतंत्र में कोई नेता सार्वजनिक सवाल उठाने पर—बिना डर के—जवाबदेही का मांग कितनी सरलता से कर सकता है, और संस्थाएँ कितनी पारदर्शिता के साथ उसका सामना कर सकती हैं।

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