हरिहर वीर मल्लू: पवन कल्याण की सनातनी सेना की कहानी पर एक आलोचनात्मक नजर
पिछले कुछ वर्षों में साउथ इंडियन सिनेमा ने ऐतिहासिक और पौराणिक कहानियों को बड़े पर्दे पर जीवंत करने का काफी प्रयास किया है। इनमें से कई फिल्में अपने दमदार दृश्यों और कहानी के कारण दर्शकों को खूब प्रभावित करती हैं, लेकिन कुछ ऐसी फिल्में भी आती हैं जो अपनी बड़ी महत्वाकांक्षाओं के बावजूद दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पातीं। पवन कल्याण की नई फिल्म ‘हरिहर वीर मल्लू’ भी कुछ वैसा ही अनुभव दे रही है।
यह फिल्म 17वीं सदी के भारतीय इतिहास को लेकर बनाई गई है, जिसमें मुगल बादशाह औरंगजेब के ज़ुल्मों से हिंदुओं की रक्षा करने वाले एक वीर सैनिक की कहानी बताई गई है। पवन कल्याण ने इस फिल्म में वीर मल्लू नामक चरित्र का रोल निभाया है, जो कोहिनूर हीरे को चुराने के मिशन पर निकलता है। फिल्म का उद्देश्य महानता, देशभक्ति और धर्म की रक्षा जैसे उच्च विचारों को प्रस्तुत करना था, लेकिन नतीजा कुछ ज़्यादा ही अधूरा और कमजोर रहा।
कहानी का सार और उसकी कमजोरियाँ
फिल्म की शुरुआत होती है उस समय से जब एक नवजात बच्चे, वीर मल्लू, नदी के किनारे तैरते हुए एक आगरहरा में पहुंचता है। यह समय था जब कृष्णा नदी के किनारे कोल्लूर के हीरा खनिक अत्याचारी जमींदारों के जुल्मों से त्रस्त थे। ये जमींदार कुतुबशाह के लिए काम करते थे, जो मुगलों के अधीन था। ये सब अत्याचार हिंदुओं पर बढ़ रहे थे और इस स्थिति से निपटने के लिए एक नायक की जरूरत महसूस की जा रही थी।
लेकिन फिल्म में वीर मल्लू की जन्म कहानी बिलकुल अस्पष्ट रखी गई है। उसका न कोई जाति है, न कोई धर्म। बस उसे हिंदुओं की रक्षा का जिम्मा सौंपा गया है। वह एक कुशल चोर है जो कोल्लूर के हीरे चोरी करता है और उन हीरों को या तो मजदूरों की भलाई के लिए या मंदिरों के लिए दान करता है। उसे मुगलों के ताज से कोहिनूर चुराने का मिशन दिया जाता है, जिसे हिंदू पौराणिक कथाओं के ‘स्यमंतक मणि’ के समान समझा गया है।
यहां तक की फिल्म का इतिहास से जोड़ने का तरीका भी काफी संदिग्ध है। जिजिया कर औरंगजेब द्वारा गैर-मुसलमानों पर लगाई गई टैक्स, और संगीत पर बैन जैसे विषयों को बिना ठोस सबूत के बड़े नाटकीय अंदाज़ में पेश किया गया है।
ऐतिहासिक तथ्यों से दूरी और राजनीतिक संदेश
फिल्म में एक दृश्य ऐसा भी है जहाँ पवन कल्याण का किरदार चारमीनार के नीचे हिंदू देवता की मूर्ति के सामने प्रार्थना करता नजर आता है। यह एक स्पष्ट राजनीतिक संकेत है, क्योंकि चारमीनार के नीचे भग्यलक्ष्मी मंदिर का विवाद वर्षों से जारी है और इसे भाजपा राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग करती रही है। यह बात दर्शाती है कि फिल्म सिर्फ इतिहास बताने का प्रयास नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी बांधी गई है।
फिल्म में औरंगजेब का चरित्र एक अत्याचारी और हिंदू विरोधी शासक के रूप में दिखाया गया है, लेकिन साथ ही कुछ ‘अच्छे मुसलमान’ भी हैं जो उसकी क्रूरता के शिकार बने हुए हैं। इसके अलावा हिंदू जमींदारों को भी क्रूर और शोषक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह साफ होता है कि फिल्म साम्प्रदायिकता की कड़वाहट को पूरी तरह से नहीं अपनाती।
अभिनय और निर्देशन का असर
निर्देशक कृष्ण जगर्लामुड़ी, जिन्होंने एनटीआर की जीवनी और ‘माणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है, इस प्रोजेक्ट को बीच में छोड़ चुके हैं। फिल्म के बाकी हिस्से की जिम्मेदारी एएम ज्योति कृष्णा और पवन कल्याण ने संभाली है। इसका असर फिल्म की गुणवत्ता पर साफ देखा जा सकता है।
पवन कल्याण, जिन्होंने खुद को ‘अनिच्छुक अभिनेता’ बताया है, इस फिल्म में भी अपने अभिनय में वह ऊर्जा नहीं ला पाए जो एक ऐतिहासिक नायक के लिए जरूरी होती है। निधि अग्रवाल, जो पंचामी का किरदार निभाती हैं, भी अपनी भूमिका में कमजोर लगती हैं। साथ ही बाकी कलाकारों के किरदार भी उतने मजबूत नहीं हैं कि वे कहानी को प्रभावशाली बना सकें।
क्या फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरी?
‘हरिहर वीर मल्लू’ के हर दृश्य में यह कोशिश की गई है कि वह ‘बाहुबली’ या ‘RRR’ जैसी फिल्मों की याद दिलाए, लेकिन जब कहानी और संवाद कमजोर हों तो वह प्रयास बेकार लग जाता है। फिल्म में एक्शन तो भरपूर है, लेकिन उसमें भावनात्मक गहराई, चरित्र विकास और कहानी में तारतम्यता नहीं है।
फिल्म अपने राजनीतिक और सांप्रदायिक संदर्भों पर इतना निर्भर दिखती है कि दर्शक से उम्मीद की जाती है कि वह खुद ही भावनात्मक और कलात्मक कमी को पूरा कर दे।
‘हरिहर वीर मल्लू’ एक ऐसे विषय को उठाती है जो आज के दौर में बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है — धर्म, देशभक्ति, और सामाजिक न्याय। लेकिन फिल्म की पटकथा, निर्देशन, अभिनय और इतिहास के प्रति लापरवाही इसे एक कमजोर और अधूरी फिल्म बना देती है। यह केवल एक ऐतिहासिक युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और राजनीतिक संदेश भी है, जो सही तरीके से प्रस्तुत नहीं हो पाया है।
पवन कल्याण के लिए यह फिल्म उनके करियर में एक ऐसा पड़ाव है जो दर्शाता है कि महत्त्वाकांक्षा और राजनीति से प्रेरित फिल्म बनाना अकेले बड़े सितारों का काम नहीं होता। एक अच्छी फिल्म के लिए गहरी रिसर्च, मजबूत कहानी और कलाकारों का समर्पण भी जरूरी होता है।
अगर आप एक अच्छी ऐतिहासिक और भावनात्मक फिल्म देखने के शौकीन हैं, तो ‘हरिहर वीर मल्लू’ शायद आपकी सूची में ऊपर न हो। लेकिन यह फिल्म जरूर विचार करने वाली बातों से भरी हुई है — खासकर तब, जब इतिहास और वर्तमान राजनीति का मेल बड़े पर्दे पर दिखाया जाता है।










