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Why Tewari & Tharoor Stayed Silent in Operation Sindoor Debate

Published On: July 30, 2025
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ऑपरेशन सिंदूर बहस में मनीष तिवारी ने क्यों नहीं बोला? कांग्रेस की खामोशी पर उठाए सवाल

हाल ही में संसद में चल रही ऑपरेशन सिंदूर पर बहस ने एक बार फिर कांग्रेस के नेताओं के बीच अंदरूनी मतभेदों को उजागर किया है। खासकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद मनीष तिवारी ने एक खास अंदाज में अपने सन्नाटा रखने का कारण बताने की कोशिश की, जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक गीत के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं और साथ ही एक खबर साझा की जिसमें उनके और शशी थरूर के उस बहस में नहीं बोलने के पीछे की वजह बताई गई थी।

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि ऑपरेशन सिंदूर बहस में कांग्रेस के कुछ शीर्ष नेताओं की चुप्पी के पीछे क्या राज़ छिपा है, मनीष तिवारी ने किस तरह अपनी राय जाहिर की और इससे कांग्रेस के आंतरिक विवादों पर क्या असर पड़ा।

ऑपरेशन सिंदूर बहस: पृष्ठभूमि

सबसे पहले जान लेते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर बहस आखिर है क्या। ऑपरेशन सिंदूर एक संवेदनशील मामला है, जो संसद में गहराई से चर्चा में है। इस पर सरकार और विपक्ष के बीच तकरार चल रही है, और इस बहस को लेकर सभी पार्टियों की प्रतिक्रिया अलग-अलग रही।

इस पूरे प्रकरण में केंद्र सरकार ने कई बहु-पार्टी प्रतिनिधिमंडलों का गठन किया ताकि देश की छवि विदेशों में बेहतर बनाई जा सके। इन प्रतिनिधिमंडलों में कई कांग्रेस सांसद भी शामिल थे, जिनका काम था भारत के सकारात्मक पहलुओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रखना। लेकिन संसद के अंदर ऑपरेशन सिंदूर पर बहस के दौरान कांग्रेस ने अपनी रणनीति अलग रखी। खास बात यह रही कि उन सांसदों को जिनका नाम बहु-पार्टी प्रतिनिधिमंडलों में था, बहस के वक्त पार्टी की ओर से बोलने के लिए सूची में शामिल नहीं किया गया।

मनीष तिवारी और शशी थरूर का नाम बहस में क्यों नहीं?

मनीष तिवारी ने मंगलवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर एक गीत साझा किया, जो मनोज कुमार की फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ (1970) का था। इस गीत के बोल कुछ इस तरह थे — “जहां प्यार हमारी संस्कृति का हिस्सा है, उस धरती का मैं गीत गाता हूं। मैं भारत से आया हूं, भारत की कहानी गाता हूं।” इस पोस्ट के साथ उन्होंने एक खबर भी साझा की, जिसका शीर्षक था — “सरकार के पक्ष में बोले: क्यों कांग्रेस ने ऑपरेशन सिंदूर बहस के दौरान शशी थरूर और मनीष तिवारी को बेंच किया।”

यह खबर इस बात की ओर इशारा करती थी कि जिन कांग्रेस सांसदों को बहु-पार्टी प्रतिनिधिमंडल में रखा गया था, उनमें से किसी को भी पार्टी ने संसद की बहस में बोलने के लिए नामित नहीं किया। खासकर शशी थरूर और मनीष तिवारी जैसे वरिष्ठ सांसद, जो इस सूची में थे, उन्हें इस बहस में बोलने का मौका नहीं मिला।

कांग्रेस नेतृत्व के लिए यह स्थिति थोड़ी असुविधाजनक थी, खासकर शशी थरूर के मामले में, क्योंकि बिना किसी पूर्व अनुमति के उन्हें सरकार की ओर से चुना गया था। फिर जब ये सांसद सरकार की नीतियों की सराहना करने लगे, तो पार्टी की मुश्किलें और बढ़ गईं।

शशी थरूर की प्रतिक्रिया: “मौनव्रत”

जब सोमवार को शशी थरूर से इस विषय पर सवाल पूछा गया कि उन्हें कांग्रेस की वक्ताओं की सूची में क्यों नहीं रखा गया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया — “मौनव्रत।” यानी उन्होंने अपने तौर पर चुप्पी का संकल्प लिया था।

यह जवाब इस बात का संकेत था कि कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे को लेकर किस हद तक नकारात्मक माहौल था। पार्टी शायद उन सांसदों की सरकार की तारीफ को लेकर असहज महसूस कर रही थी, इसीलिए बहस के वक्त उन्हें बोलने का मौका नहीं दिया गया।

कांग्रेस की आंतरिक असहमति

मनीष तिवारी और शशी थरूर के व्यवहार से साफ है कि कांग्रेस पार्टी के अंदर इस पूरे मामले को लेकर असहमति और विवाद की स्थिति बनी हुई है। जब सांसद सरकार की नीति की आलोचना की बजाय तारीफ करते हैं, तो पार्टी को लगता है कि यह विपक्ष की भूमिका के खिलाफ है। लेकिन दूसरी ओर, इन नेताओं का यह भी मानना है कि देश के हित में जो सही है, उसे स्वीकार करना चाहिए।

इस विवाद ने कांग्रेस की छवि को काफी प्रभावित किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और मलिकरजुन खड़गे इस बहस में हिस्सा ले रहे हैं, लेकिन पार्टी के कुछ अन्य बड़े नेता इस पूरे मसले पर चुप्पी साधे हुए हैं।

मनीष तिवारी का गीत वाला संकेत

मनीष तिवारी का जो गीत उन्होंने साझा किया, वह एक बहुत बड़ा संकेत था। यह गीत ‘भारत की बात’ करता है, एक ऐसी भावना को दर्शाता है जो सिर्फ पार्टी लाइन या राजनीतिक नफे-नुकसान से परे है। यह गीत उनकी सोच को दर्शाता है कि वे देश के हित में हैं और वे अपने देश के प्रति गहरा प्रेम रखते हैं।

इस गीत के जरिये तिवारी शायद पार्टी के उस निर्णय को नकार रहे थे, जिसने उन्हें बहस में बोलने से रोका। वे अपने देश की बात करना चाहते थे, लेकिन पार्टी की रणनीति ने उनकी आवाज़ को दबा दिया।

आगे क्या?

ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में बहस अभी जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह भी इस बहस में हिस्सा लेंगे। वहीं विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मलिकरजुन खड़गे भी अपनी राय व्यक्त करेंगे।

लेकिन सवाल यही है कि कांग्रेस पार्टी अपने नेताओं के बीच इस मतभेद को कैसे सुलझाएगी? क्या वह ऐसे नेताओं को आगे आने का मौका देगी, जो सरकार की नीतियों की खुले दिल से आलोचना या समर्थन कर सकें? या फिर यह चुप्पी जारी रहेगी?

ऑपरेशन सिंदूर की बहस केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के आंतरिक संकट और उसकी नेतृत्व क्षमता की भी परीक्षा है। मनीष तिवारी और शशी थरूर जैसे नेता जो खुले विचारों के लिए जाने जाते हैं, उनकी चुप्पी इस बात की गवाही देती है कि पार्टी में कहीं न कहीं संवाद की कमी है।

देश की राजनीति में आलोचना और समर्थन दोनों का महत्व है, लेकिन पार्टी नेतृत्व को चाहिए कि वह अपने सांसदों को स्वतंत्रता दे ताकि वे अपने विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकें।

मनीष तिवारी का साझा किया गया गीत और उनकी पोस्ट बताती है कि वह देश के लिए बोलना चाहते हैं, लेकिन राजनीतिक कारणों से उनकी आवाज़ दबाई गई। यह कांग्रेस के लिए एक चेतावनी भी है कि वह अपनी पार्टी को एकता के साथ आगे कैसे बढ़ाए।

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